The Great Liberation Tantra· 3.71 / 153

The Great Liberation Tantra3.71

3.71
भूर्जे विलिख्य गुटिकां स्वर्णस्थां धारयेत् यदि । कण्ठे वा दक्षिणे बाहो सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् ॥७१॥
bhūrje vilikhya guṭikāṃ svarṇasthāṃ dhārayet yadi | kaṇṭhe vā dakṣiṇe bāho sarvasiddhīśvaro bhavet ||71||
— भोजपत्र पर ; — लिखकर ; — गुटिका को ; — सोने में जड़ी ; — धारण करे ; — यदि ; — कण्ठ में ; — अथवा ; — दाहिनी ; — भुजा पर ; — समस्त सिद्धियों का ईश्वर ; — हो

यदि भोजपत्र पर लिखकर सोने में जड़ी गुटिका को कण्ठ में या दाहिनी भुजा पर धारण करे, तो वह समस्त सिद्धियों का ईश्वर हो जाता है।