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Vijñāna Bhairava Tantra· 1.98 / 163

Vijñāna Bhairava Tantra1.98

1.98
मध्यजिह्वे स्फारितास्ये मध्ये निक्षिप्य चेतनाम् । उच्चरन्मनसा मन्त्रं शिवो ध्यायन्प्रशाम्यति ॥९८॥
madhyajihve sphāritāsye madhye nikṣipya cetanām | uccaran manasā mantraṃ śivo dhyāyan praśāmyati
anuṣṭubh
— मध्य-जिह्वा में (अधिकरण — समासगत) ; — मुख विस्तृत खोलकर (समासगत विशेषण) ; — मध्य में चेतना निक्षिप्त करके (अधिकरण + कर्म + क्त्वान्त) ; — मानसिक रूप से मन्त्र का उच्चारण करता हुआ (वर्तमान कृदन्त + करण + कर्म) ; — शिव का ध्यान करता हुआ (कर्म + वर्तमान कृदन्त) ; — पूर्णतः शान्त हो जाता है (वर्तमान काल)

जिह्वा को मध्य में रखकर, मुख विस्तृत खोलकर, मध्य में चेतना को निक्षिप्त करके, मानसिक रूप से मन्त्र का उच्चारण करते हुए शिव का ध्यान करता हुआ (साधक) पूर्णतः शान्त हो जाता है। (धारणा ८०)