The Essence of the Tantra· 13.65 / 101

The Essence of the Tantra13.65

13.65

तत्पातो ऽग्नियमनिरृतिदिक्षु अधश् च न शुभ इति

Transliteration (IAST)

tatpāto 'gniyamanirṛtidikṣu adhaś ca na śubha iti

— उसका पात (गिरने की दिशा) ; — अग्नि, यम एवं निरृति की दिशाओं में (आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य) ; — और नीचे ; — शुभ नहीं

उसका पात (गिरना) अग्नि, यम एवं निरृति की दिशाओं में तथा नीचे शुभ नहीं है।